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कब तलक यूँ ही चुप रहा जाए हाले-दिल क्यूँ न कह दिया जाये

  ग़ज़ल ©डॉ कविता"किरण"   कब तलक यूँ ही चुप रहा जाए हाले-दिल क्यूँ न कह दिया जाये   दिल की दिल में कहीं न रह जाये कुछ कहा और कुछ सुना जाए   जब हुई ही नहीं ख़ता हमसे सर पे इल्ज़ाम क्यूँ लिया जाए   दर्द की कोई हद तो हो आख़िर य ज़ेहर कब तलक पिया जाये   जो किसी ने नहीं किया अब तक काम ऐसा कोई किया जाए   चल "किरण"बज़्मे-ज़िंदगी से उठ हो गई शाम घर चला जाये

बस इतनी सी बात पे मशहूर हो गई हूं में  के तुझसे दूर बहोत दूर हो गई हूं में 

                                                 ग़ज़ल बस इतनी सी बात पे मशहूर हो गई हूं में  के तुझसे दूर बहोत दूर हो गई हूं में    वोह आने वाला है शमा वफा जलाने को  बस इस ख़याल से पूरनूर हो गई हूं में    अब आके लोग मेरे दर पे दस्तके देंगे  जहाने इश्क़ का दस्तुर हो गई हूं में    मेरे वजूद में यादे हैं इन्की खुशबू है जो कह रहे है के अब दूर हो गई हूं में    मुझे यक़ीन है ,शाइस्ता, इस के आने का ये क्या है सबब है के रन्जूर हो गई हूं मे                                 शाइस्ता जमाल

शाइस्ता जमाल भोपाल व हिंदुस्तान की मशहूर शायरा

शाइस्ता जमाल मशहूर शायरा जिनका कलाम सुनकर हम उम्र शायरो के साथ उस्ताद शायरों ने भी शाइस्ता जमाल का कलाम बहुत पसंद किया है शाइस्ता जमाल जो पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपना योगदान रखती थी वह "शाइस्ता टाइम्स" समाचार पत्र की संपादक भी थे शाइस्ता जमाल शाहिद जमाल की बेटी थी शाहिद जमाल साहब भी सामाजिक कार्यकर्ता है। शाइस्ता जमाल ने कई बड़े-बड़े मुशायरा में हिस्सा लिया और कई टीवी प्रोग्राम्स में भी हिस्सा लिया। 7 साल की लंबी बीमारी के बाद अभी हाल ही में 42 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ। हम भोपाल की मशहूर शायरा और भोपाल की बेटी को ख़िराजे अकीदत  पेश करते हैं  

वो कागज की कश्ती वो बारिश???? का पानी।

कोई मुझको ???? लौटा दे वो बचपन का सावन, ???? वो कागज की कश्ती वो बारिश???? का पानी। वो  भी क्या दिन थे मेरे..! ???? न फ़िक्र कोई..न दर्द कोई..!! बस खेलो, ???? खाओ, सो जाओ..! बस इसके सिवा कुछ ???? याद नहीं..! पैसे की सोच और न लाइफ के फंडे, न कल की चिंता और न फ्यूचर के सपने, अब कल की फिकर और अधूरे सपने, मुड़ कर देखा तो बहुत दूर हैं अपने, मंजिलों को ढूंडते हम कहॉं खो गए, नहीं जाने क्‍यूँ हम इतने बड़े हो  गए|

हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है।

 शायर:अकबर इलाहाबादी मौत आई इश्क़ में तो हमें नींद आ गई निकली बदन से जान तो काँटा निकल गया मज़हबी बहस मैंने की ही नहीं फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं   आह जो दिल से निकाली जाएगी क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी बस जान गया मैं तिरी पहचान यही है तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता   दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीदार नहीं हूं खींचो न कमानों को न तलवार निकालो जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो   हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है   अकबर इलाहाबादी ने सैयद अकबर हुसैन के नाम से 1921   में इलाहाबाद के निकट बारा में एक सम्मानजनक, परिवार में जन्म लिया। उनके पिता का नाम सैयद तफ्फज़ुल हुसैन था।  जन्म: 16 नवंबर 1846, इलाहाबाद(प्रयागराज) मृत्यु: 15 फ़रवरी 1921, इलाहाबाद(प्रयागराज) जन्म नाम: सैयद हुसैन

मुसीबत चाहे कितनी भी बड़ी हो, खोजने पर समाधान मिल ही जाता है।

एक बार की बात है एक मल्लाह के पास घास का ढेर, एक बकरी और एक भेड़िया होता है। उसे ये तीनो को नदी के उस पार के बारे में जाना होता है। पर छोटी छोटी होने के कारण वह एक बार में किसी एक चीज को ही अपने साथ ले जा सकता है। अब अगर वह अपने साथ भेड़िया को ले जाता है तो बकरी घास खा जाती है। अगर वह घास को ले जाता है तो भेड़िया बकरी खा जाता है। इस तरह वह परेशान हो जाता है कि फिर क्या है? उसने कुछ देर सोचा और फिर उसके दिमाग में एक योजना आई। सबसे पहले वह बकरी को ले कर उस पार गया। और वहाँ बकरी को छोड़ कर, वापस इस पार अकेला लौट आया। उसके बाद वह दूसरी यात्रा में भेड़िया को उस पार ले गया। और वहाँ खड़ी बकरी को अपने साथ वापस इस पार ले आया। इस बार उसने बकरी को वहीँ बाँध दिया और घास का ढेर लेकर उस पार चला गया। और भेड़िया के पास उस ढेर को छोड़ कर अकेले इस पार लौट आया। और फिर अंतिम यात्रा में बकरी को अपने साथ ले कर उस पार चला गया। सीख -  मुसीबत चाहे कितनी भी बड़ी हो, खोजने पर समाधान मिल ही जाता है।

अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए

यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का  वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे  - जौन एलिया मैं जब सो जाऊँ इन आँखों पे अपने होंट रख देना  यक़ीं आ जाएगा पलकों तले भी दिल धड़कता है  - बशीर बद्र अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए  अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए  - उबैदुल्लाह अलीम मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा  सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए  - कृष्ण बिहारी नूर मुझे तन्हाई की आदत है मेरी बात छोड़ें  ये लीजे आप का घर आ गया है हात छोड़ें  - जावेद सबा   बेचैन इस क़दर था कि सोया न रात भर  पलकों से लिख रहा था तिरा नाम चाँद पर  - अज्ञात इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी  लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे  - बशीर बद्र तुम मुझे छोड़ के जाओगे तो मर जाऊँगा  यूँ करो जाने से पहले मुझे पागल कर दो  - बशीर बद्र   तुम क्या जानो अपने आप से कितना मैं शर्मिंदा हूँ  छूट गया है साथ तुम्हारा और अभी तक ज़िंदा हूँ  - साग़र आज़मी वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा  मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा  - परवीन शाकिर दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं  कितना हसीं गुनाह कि

चले आओ मेरे ख्वाबों की ताबीर ले आओ

चले आओ मेरे ख्वाबों की ताबीर ले आओ मैं तेरे तसव्वुर की गहराई में हूं दीवाना जमाने से हरजाई मैं हूं तेरी तन्हाई मैं मेरी महफिल सजती है  मैं हूं शमा तू है परवाना मोहब्बत में हम को जल के हैं मिट जाना गर जलना ही है तो जले जाओ चले जाओ मेरे ख्वाबों की ताबीर ले आओ चले आओ चले आओ  

हम अहल-ए-मोहब्बत हैं फ़ना हो नहीं सकते,, ,,"असद भोपाली,,

  कुछ भी हो वो अब दिल से जुदा हो नहीं सकते हम मुजरिम-ए-तौहीन-ए-वफ़ा हो नहीं सकते ऐ मौज-ए-हवादिस तुझे मालूम नहीं क्या हम अहल-ए-मोहब्बत हैं फ़ना हो नहीं सकते इतना तो बता जाओ ख़फ़ा होने से पहले वो क्या करें जो तुम से ख़फ़ा हो नहीं सकते इक आप का दर है मिरी दुनिया-ए-अक़ीदत ये सज्दे कहीं और अदा हो नहीं सकते अहबाब पे दीवाने 'असद' कैसा भरोसा ये ज़हर भरे घूँट रवा हो नहीं सकते     जब अपने पैरहन से ख़ुशबू तुम्हारी आई घबरा के भूल बैठे हम शिकवा-ए-जुदाई फ़ितरत को ज़िद है शायद दुनिया-ए-रंग-ओ-बू से काँटों की उम्र आख़िर कलियों ने क्यूँ न पाई अल्लाह क्या हुआ है ज़ोम-ए-ख़ुद-एतमादी कुछ लोग दे रहे हैं हालात की दुहाई ग़ुंचों के दिल बजाए खिलने के शक़ हुए हैं अब के बरस न जाने कैसी बहार आई इस ज़िंदगी का अब तुम जो चाहो नाम रख दो जो ज़िंदगी तुम्हारे जाने के बाद आई

तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ ,अल्लामा इक़बाल

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है     सितारों से आगे जहाँ और भी हैं अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं   माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख   हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा   तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ

इस्लामी सभ्यता पर मुंशी प्रेमचंद का वह लेख जिसे हर हिंदुस्तानी को पढ़ना चाहिए

पुण्यतिथि इस्लामी सभ्यता पर मुंशी प्रेमचंद का वह लेख जिसे हर हिंदुस्तानी को पढ़ना चाहिए इस्लामी सभ्यता पर मुंशी प्रेमचंद का यह लेख सबसे पहले 1925 में 'प्रताप' में प्रकाशित हुआ था सत्याग्रह ब्यूरो 08 अक्टूबर 2019 हिंदू और मुसलमान दोनों एक हज़ार वर्षों से हिंदुस्तान में रहते चले आये हैं. लेकिन अभी तक एक-दूसरे को समझ नहीं सके. हिंदू के लिए मुसलमान एक रहस्य है और मुसलमान के लिये हिंदू एक मुअम्मा (पहेली). न हिंदू को इतनी फुर्सत है कि इस्लाम के तत्वों की छानबीन करे, न मुसलमान को इतना अवकाश है कि हिंदू-धर्म-तत्वों के सागर में गोते लगाये. दोनों एक दूसरे में बेसिर-पैर की बातों की कल्पना करके सिर-फुटौव्वल करने में आमादा रहते हैं. हिंदू समझता है कि दुनियाभर की बुराइयां मुसलमानों में भरी हुई हैं : इनमें न दया है, न धर्म, न सदाचार, न संयम. मुसलमान समझता है कि हिंदू, पत्थरों को पूजने वाला, गर्दन में धागा डालने वाला, माथा रंगने वाला पशु है. दोनों बड़े दलों में जो बड़े धर्माचार्य हैं, मानो द्वेष और विरोध ही उनके धर्म का प्रधान लक्षण है. हम इस समय हिंदू-मुस्लिम-वैमनस्य पर कुछ नहीं कहना चा

खून सफेद मुंशी प्रेमचंद की कहानी

हिंदी कहानी   मुंशी प्रेमचंद     खून सफेद . . मुंशी प्रेम चंद चैत का महीना था, लेकिन वे खलियान, जहाँ अनाज की ढेरियाँ लगी रहती थीं, पशुओं के शरणास्थल बने हुए थे; जहाँ घरों से फाग और बसन्त का अलाप सुनाई पड़ता, वहाँ आज भाग्य का रोना था। सारा चौमासा बीत गया, पानी की एक बूँद न गिरी। जेठ में एक बार मूसलाधार वृष्टि हुई थी, किसान फूले न समाए। खरीफ की फसल बो दी, लेकिन इन्द्रदेव ने अपना सर्वस्व शायद एक ही बार लुटा दिया था। पौधे उगे, बढ़े और फिर सूख गए। गोचर भूमि में घास न जमी। बादल आते, घटाएं उमड़तीं, ऐसा मालूम होता कि जल-थल एक हो जाएगा, परन्तु वे आशा की नहीं, दुःख की घटाएँ थीं। किसानों ने बहुतेरे जप-तप किए, ईंट और पत्थर देवी-देवताओं के नाम से पुजाएं, बलिदान किए, पानी की अभिलाषा में रक्त के पनाले बह गए, लेकिन इन्द्रदेव किसी तरह न पसीजे। न खेतों में पौधे थे, न गोचरों में घास, न तालाबों में पानी। बड़ी मुसीबत का सामना था। जिधर देखिए, धूल उड़ रही थी। दरिद्रता और क्षुधा-पीड़ा के दारुण दृश्य दिखाई देते थे। लोगों ने पहले तो गहने और बरतन गिरवी रखे और अन्त

गुप्त धन मुंशी प्रेम चंद की कहानी

  गुप्त धन मुंशी प्रेम चंद बाबू हरिदास का ईंटों का पजावा शहर से मिला हुआ था। आसपास के देहातों से सैकड़ों स्त्री-पुरुष, लड़के नित्य आते और पजावे से ईंट सिर पर उठा कर ऊपर कतारों से सजाते। एक आदमी पजावे के पास एक टोकरी में कौड़ियाँ लिए बैठा रहता था। मजदूरों को ईंटों की संख्या के हिसाब से कौड़ियाँ बाँटता। ईंटें जितनी ही ज्यादा होतीं उतनी ही ज्यादा कौड़ियाँ मिलतीं। इस लोभ में बहुत से मजदूर बूते के बाहर काम करते। वृद्धों और बालकों को ईंटों के बोझ से अकड़े हुए देखना बहुत करुणाजनक दृश्य था। कभी-कभी बाबू हरिदास स्वंय आ कर कौड़ीवाले के पास बैठ जाते और ईंटें लादने को प्रोत्साहित करते। यह दृश्य तब और भी दारुण हो जाता था जब ईंटों की कोई असाधारण आवश्यकता आ पड़ती। उसमें मजूरी दूनी कर दी जाती और मजूर लोग अपनी सामर्थ्य से दूनी ईंटें ले कर चलते। एक-एक पग उठाना कठिन हो जाता। उन्हें सिर से पैर तक पसीने में डूबे पजावे की राख चढ़ाये ईंटों का एक पहाड़ सिर पर रखे, बोझ से दबे देख कर ऐसा जान पड़ता था मानो लोभ का भूत उन्हें जमीन पर पटक कर उनके सिर पर सवार हो गया है। सबसे करुण दशा एक छोटे लड़के की थी जो स

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है , शायर अल्लामा इक़बाल

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन दिल से जो बात निकलती है असर रखती है पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख असर करे न करे सुन तो ले मिरी फ़रियाद नहीं है दाद का तालिब ये बंदा-ए-आज़ाद   असल मायने महबूब से इश्क के इकरार और तकरार से है... यूं तो शेरो-शायरी के असल मायने महबूब से इश्क के इकरार और तकरार से है, लेकिन इकबाल इन सभी से बेहद आगे हैं। वो अपने शेरों में सिर्फ माशूका की खूबसूरती, उसकी जुल्फें, उसके यौवन की बात नहीं करते बल्कि उनके शेरों में मजलूमों का दर्द भी नजर आता। मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ नशा पिला के गिराना तो सब को आता है मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी तेरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ लज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों में दिल की बस्ती अजीब बस्ती है, लूटने वाले को तरसती है दुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया हो लज़्ज़त सरोद की हो चिड़िय

हिदुस्तान जिंदाबाद

*हा  मैं Manish Tiwari भारतीय हिंदू हुँ,  और ये कड़वा सच भी जानता हूँ* %%%%%%% ताज महल = मुसलमानों ने बनाया; लाल किला = मुसलमानों ने बनाये ; कुतुबमीनार = मुसलमानों ने बनाई; चार मीनार = मुसलमानों ने बनाई; गोल गुम्बज = मुसलमानों ने बनाया; लाल दरवाजे = मुसलमानों ने बनाये; मिसाइल= मुस्लिम ने बनाई (डा.कलाम); इंडिया गेट = अंग्रेजो ने बनाया गेटवे ऑफ इंडिया = अंग्रेजो ने बनाया हावड़ा ब्रिज= अंग्रेजो ने बनाया; पार्लियामेंट हाउस= अंग्रेजों ने बनाया ; राष्ट्रपति भवन = अंग्रेजों ने बनाया; नॉर्थ-साऊथ ब्लॉक= अंग्रेजों ने बनाया ; कनॉट प्लेस = अंग्रेजों ने बनाया . संविधान= SC ने बनाया (डॉ. अम्बेडकर); *तो ये हिन्दू लीडर भारत में करते क्या आ रहे है ?* कड़वा सच (A)हिन्दू भाइयों को देश के इतिहास के नाम पर बेवक़ूफ़ बनाते आरहे है  (B) देश को गुलाम बनाते रहे हैं ! (C) देश, धर्म, संस्कृति, सभ्यता और समाज को कमजोर करते रहे हैं ! (D) देश में जाति-धर्म के नाम पर दंगा कराते रहे हैं ! (E) देश को तोड़ते रहे हैं ! (F) *देश का धन और धार्मिक भय के नाम पर मंदिरों में इकट्ठा करते रहे हैं !* काँग्रेस जब सत्ता मे थी तब ब

अक्सर झोपड़ी पे लिखा होता है: "सुस्वागतम" और महल वाले लिखते हैं: "कुत्तों सॆ सावधान"

एक हसीन लडकी राजा के दरबार में डांस कर रही थी... ( राजा बहुत बदसुरत था ) लडकी ने राजा से एक सवाल की इजाजत मांगी . राजा ने कहा , " चलो पुछो ." . लडकी ने कहा , "जब हुस्न बंट रहा था तब आप कहां थे..?? . राजा ने गुस्सा नही किया बल्कि मुस्कुराते हुवे कहा ~ जब तुम हुस्न की लाइन् में खडी हुस्न ले रही थी , ~ . ~ तो में किस्मत की लाइन में खडा किस्मत ले रहा था . और आज तुझ जैसीे हुस्न वालीयां मेरी गुलाम की तरह नाच रही है........... . इसलीय शायर खुब कहते है, . " हुस्न ना मांग नसीब मांग ए दोस्त , हुस्न वाले तो अक्सर नसीब वालों के गुलाम हुआ करते है... " जो भाग्य में है , वह भाग कर आएगा, जो नहीं है , वह आकर भी भाग जाएगा....!!!!!." यहाँ सब कुछ बिकता है , दोस्तों रहना जरा संभाल के, बेचने वाले हवा भी बेच देते है, गुब्बारों में डाल के, सच बिकता है , झूट बिकता है, बिकती है हर कहानी, तीनों लोक में फेला है , फिर भी बिकता है बोतल में पानी , कभी फूलों की तरह मत जीना, जिस दिन खिलोगे , टूट कर बिखर्र जाओगे , जीना है तो पत्थर की तरह जियो ; जिस दिन तराशे गए , " भगवान " बन

मुझे इज़्ज़त से बस दो वक़्त की रोटी कमाने दो

कहाँ कहता हूँ महलों की जगह झुग्गी बसाने दो मुझे इज़्ज़त से बस दो वक़्त की रोटी कमाने दो तुम्हारा घर रहे रौशन तुम्हारे चाँद सूरज से मेरे घर के चराग़ों को भी थोड़ा झिलमिलाने दो शहर में आ गिरा है इक परिंदा गाँव का शायद बहुत रोयेगी उसकी माँ, उसे घर लौट जाने दो लहर के साथ बह जाने का फ़न सीखा नहीं मैंने करूँगा सामना गर डूबता हूँ, डूब जाने दो मेरे पाँवों के छाले देखकर मुँह फेरने वालो! दिखा दूँगा तुम्हें रफ़्तार अपनी, वक़्त आने दो वो कहता है झुका लूँ सर तो मुझको ज़िन्दगी देगा यही क़ीमत है मेरी जां की तो फिर मर ही जाने दो ग़ज़लकार-डॉ. मनोज कुमार

कल रात की है बात

कल रात की है बात कि  अकस्मात एक ब्यूटी गर्ल ने हमारा रास्ता रोका हम समझे पहचान ने में खा गई धोखा हम शरिफ़ ज़ादे वहां से गुज़र गये गुस्से  से कन्या के के केश बिखर गए ज़ोर--ज़ोर से चिल्लाने लगी ए शहर के जवां मर्दो आओ और मुझे इस शरीफ़ ज़ादे से बचाओ मैं अपनी ज़ुल्फो में अवध की सुबह और बनारस की शाम और चेहरे पे कश्मीर  का पानी रखती हूं इस लफंगे मुझे क्यों नहीं छेड़ा  क्या मैं इसकी मां लगती हू   आज के हालात पर          

उदास रहता है मोहल्ले में बारिशों का पानी आजकल. . ....

उदास रहता है मोहल्ले में .... बारिशों का पानी आजकल...  ..... सुना है कागज़ की नाव बनाने वाले बच्चे बड़े हो गए                                                       बदल जाओ   बदल जाओ वक्त के साथ या फिर वक्त बदलना सीखो मजबूरियों को मत कोसो हर हाल में चलना सीखो                   हंसी बर्बाद ना कर ! गुजरी हुई जिंदगी को कभी याद ना कर, तकदीर में जो लिखा है उसकी फरियाद ना कर, जो होगा वो होकर रहेगा, तु कल की फिकर में अपनी आज की हंसी बर्बाद ना कर !                 सुन्दरता खूबसूरती वो है जो सबको दिखाई देती है और  खूबसूरती वो है जो सबको दिखाई देती है और  सुन्दरता  किसी किसी को नजर आती है...                        इज़हार जाने कब आपसे प्यार का इज़हार होगा, जाने कब आपको हमसे प्यार जोगा, गुजर रही हैं आपकी ही याद में ये रातें, जाने कब आपको भी हमारा इंतज़ार होगा।