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Showing posts from December 1, 2020

कब तलक यूँ ही चुप रहा जाए हाले-दिल क्यूँ न कह दिया जाये

  ग़ज़ल ©डॉ कविता"किरण"   कब तलक यूँ ही चुप रहा जाए हाले-दिल क्यूँ न कह दिया जाये   दिल की दिल में कहीं न रह जाये कुछ कहा और कुछ सुना जाए   जब हुई ही नहीं ख़ता हमसे सर पे इल्ज़ाम क्यूँ लिया जाए   दर्द की कोई हद तो हो आख़िर य ज़ेहर कब तलक पिया जाये   जो किसी ने नहीं किया अब तक काम ऐसा कोई किया जाए   चल "किरण"बज़्मे-ज़िंदगी से उठ हो गई शाम घर चला जाये